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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

मात्रास्पर्शा हि कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनो नित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

उसमें पहले (विषय ही सुख-दुःखरूप हैं” यों अभेद- भ्रम का निरास कर रहे भगवान्‌ कहते हैं। हे कौन्तेय, इन्द्रियों के विषयसम्बन्ध ही शोतोष्णादि अनुभवों से जनित सुख-दुःख देते हैं । हे भारत, वे इन्द्रिय-विषय-सम्बन्ध सदा उत्पद्यमान और विनश्यमान हैं, अतःउन्हे तुम सहो