Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
अकर्तृत्वादभोक्तृत्वमभोक्तृत्वात्समैकता ।
समैकत्वादनन्तत्वं ततो ब्रह्मत्वमाततम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
अकर्तृत्व सिद्धि से भूमिका क्रम के अनुसार विदेह कैवल्य तक की सिद्धि हो जाती है, यह कहते हैं ।
कर्तृत्वाभिमान न रहने से अभोक्तृत्व की सिद्धि होती है ओर भोक्तृत्व के अभाव से समेकरूपता
की सिद्धि होती है । समेकरूपता की सिद्धि हो जाने से अनन्तता ओर उसके अनन्तर विस्तृत
ब्रह्मरूपता की सिद्धि होती है