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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

सब कर्मो का त्याग करने पर भी यदि मन में विषयों के प्रति आसक्ति बनी रहे तो वह त्याग दाम्भिक त्याग ही है, यह कहते हैं। हे अर्जुन, जो विमूढात्मा (कार्य-अकार्य के विवेक से शून्य) पुरुष (मुक्ति के साधनभूत अपने वैदिक कर्मो को छोडकर) बाहर से कर्मेन्द्रियो का निरोधकर (आँख आदि को जबरन मुँदकर) मन से इन्द्रियार्थों का (शब्दादि विषयों का) चिन्तन करता हुआ स्थित रहता है, वह सज्जनो द्वारा आत्मवंचक कहा जाता हे