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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

ओर जो मनसहित सभी इन्द्रियों का निग्रह करता है, वह शास्त्रानुसार विहित कर्मों को करता हुआ भी, उनके फलों में आसक्ति न होने से, संन्यास के फल का भागी होता है, इस आशय से उसकी प्रशंसा करते हुए कहते है । हे अर्जुन जो मुमुक्षु विद्वान्‌ ज्ञानेन्द्रियों का मन से संयमकर यानी चक्षु आदि इन्द्रियो को राग, द्वेष आदि दोषों से दूरकर कर्मेन्द्रियों से (चित्तशुद्धि के उपयोगी) श्रौत-स्मार्त कर्मो को (ईश्वरार्पणबुद्धि से) करता है, वह पूर्वोक्त आत्मवंचक की अपेक्षा कहीं अधिक श्रेष्ठ है