Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्करिष्यसि कौन्तेय तदात्मेति स्थिरो भव ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
सव कुछ ब्रह्मरूप ही है, इस निश्चय में स्थिर रहना ही समस्त कर्मो को मेरे अर्पण करना है, इस
आशय से कहते हैँ ।
हे कौन्तेय, जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ होमते हो, जो कुछ देते हो ओर
भविष्य में जो कुछ शात्त्रानुकूल अनुष्ठान करोगे; वह सब आत्मरूप ही है - इस प्रकार की बुद्धि
में सुस्थिर हो जाओ