Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।
भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
“सुख, दुःख आदि दन्द्रो से विनिर्मुक्त महात्मा ब्रह्मपद पाते है" यह जो पहले कहा गया है, उसमें
न्द्रो के सम्बन्ध में कारण क्या है ? उनसे छुटकारा पाने का उपाय क्या है ? तथा किसके अवलम्बन
से छुटकारा होता है ? इन सब आशंकाओं का परिहार करते हुए आत्मतत्व का उपदेश देने की इच्छावाले
भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजी कहते हैं।
श्रीभगवान् ने कहा : हे महावाहो, फिर मेरे उत्तम वचन सुनो, जिन्हे प्रम से सुनने की इच्छा कर रहे
तुमसे मेँ केवल कल्याण की कामना से कहता हूँ
सर्ग सन्दर्भ
तिरपनवाँ सर्ग समाप्त चौवनवाँ सर्ग सुख, दुःख आदि के सम्बन्ध में हेतु, उनसे छुटकारा पाने का उपाय तथा जिसके अवलम्बन से उनसे छुटकारा होता है-इन सबका वर्णन ।