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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

सर्वत्वादात्मनश्चैते सुभेदाः संस्थिता इव । असद्रूपास्त्वसद्रूपं कथं सोढुं न शक्यते ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि शंका हो कि अप्रिय दुःख आदि अपने-अपने प्रतिकूल वेदनीयत्वस्वभाव का जब परित्याग करें, तभी तो वे सह्य होंगे; परंतु वे कैसे उसका परित्याग कर सकेंगे ? इस पर कहते हैं। निरतिशय आनन्दरस से परिपूर्ण आत्मा ही सब कुछ है, इसलिए सुख, दुःख आदि सब विषयभेद एक तरह से सुभेदरूप यानी प्रियतम धन, पुत्र आदिस्वरूप होकर ही अवस्थित हे । उन दन्द मे पूर्व- कालीन जो प्रतिकूल वेदनीयत्व है, उसरूप से तो वे असत्स्वरूप ही हैं, इसलिये वे क्यों नहीं सहे जा सकेंगे। अर्थात्‌ सहे ही जा सकेंगे