Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 50

37 verse-groups

  1. Verse 1(अमृत-पान से) भलीर्भोति परिपूर्णं (तृप्त) हो चुके हैं
  2. Verse 2अपने अनुभव के साथ - पूर्णमदः पूणमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूणमिव…
  3. Verse 3ब्रह्मन्‌, बहुत लोगों के ज्ञान की अभिवृद्धि के लिए लीलावश मैं आपसे यह प्रश्न पूछता हू । म…
  4. Verses 4–5चूँकि अर्थो के अनुभवों का उल्लेख सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में ही देखा जाता है (मेरे हृद…
  5. Verse 6महर्षे, जडस्वरूप भी ये इन्द्र्यो शरीर के भीतर घटादि बाह्य पदार्थो का अनुभव कैसे करती हैं…
  6. Verse 7इस पर शंका हो कि पहले घट आदि बाह्य विषय चक्षु आदि इन्द्रियो को अपने प्रदेश में खिंचते हैं…
  7. Verse 8यदि शंका हो कि तत्त्वज्ञान से समस्त संशयो से रहित हुए आपको मायामय, सव प्रकार की अनुपपत्ति…
  8. Verse 9यह आप बहुत ही थोड़ा कहते हैं कि गोलको से भिन्न दूसरी इन्द्रियाँ नहीं है; क्योकि वास्तविक…
  9. Verse 10यदि कल्पना द्वारा द्रष्टा ओर दृश्य की उपपत्ति मानते हो तो इन्द्रिय आदि से घटित पुर्यष्टकर…
  10. Verse 11कहे गये अर्थ में मारयां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्‌ । अस्यावयवभूतैस्तु व्याप…
  11. Verse 12इन्द्रियों द्वारा बाहर निकला हुआ पुर्यष्टकघटक चित्त पहले घटादि से सम्बद्ध होता है । बाद म…
  12. Verse 13यदि ऐसा ही है तो उस पुर्यष्टक का ही स्वरूप क्‍या है ? जो पंचीकृत भ्रूतांशरूप जगत्‌ के आका…
  13. Verses 14–15उस पुर्यष्टक का स्वरूप बतलाने के लिए महाराज विष्ठजी पहले उसके मूलभूत अज्ञात ब्रह्मतत्त्व…
  14. Verses 16–17अभिमान, मनन आदि व्यापारो के भेद से उसके अहंकार, मन आदि भिन्न-भिन्न नाम है, यह कहते हैं। अ…
  15. Verse 18(७) अध्यासवश ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, साक्षित्व आदि धर्मो से युक्त (ज्ञानेन्द्रियो…
  16. Verse 19इसीलिए स्व-स्वरूपभरूत समझी गई बुद्धिवृक्तियो का कालमेद से भेद होने के कारण जीव भी (&) “उन…
  17. Verse 20जैसे बीजों के आकार अंकुर, काण्ड, पल्लव आदि होते हैं, वैसे ही उसी समष्टिव्यष्टयात्यक जीव क…
  18. Verse 21इसीलिए "आद्य चिदात्मा मेँ नहीं हूँ, किंतु शरीर आदि आकारवाला ही मैं हूँ, यों मिथ्याज्ञान स…
  19. Verse 22वासनाओं से वेष्टित हुआ यह जीव चिरकाल तक स्वर्ग-नरक में आवागमनों द्वारा जगत्‌ में उस प्रका…
  20. Verse 23सनक आदि के सदृश कोई तो विशुद्ध जाति के प्रभाव से कल्प के प्रारम्भ में ही यानी पूर्वकल्प क…
  21. Verse 24बहुत काल तक अनेक योनियों में प्राप्त सुख-दुःखादि भोगों के अनंतर व्याकुल हुआ कोई पुरुष आत्…
  22. Verse 25"कथं घटादिबाह्यत्वमिन्द्रियाणि जडान्यपि” यह जो प्रश्न श्रीरामचन्द्रजी ने पूछा था, उसका सा…
  23. Verse 26श्रीरामभद्र, पुर्यष्टक में प्रतिबिम्बित होने के कारण परिच्छिन्न आकार से युक्त तथा जीवरूपत…
  24. Verse 27जब आन्तर वस्तुओं से अन्य बाह्य घट आदि पदार्थो का प्रत्यक्ष करना होता है तव तालाब से झटके…
  25. Verse 28श्रीरामजी, बाह्य विषयों के ज्ञान में इन्द्रियसन्निकर्षं ही सदा कारण है ओर वह इन्द्रियों क…
  26. Verse 29बाहर ऐसा ही होता है, यह हम मान लेते हैं, परंतु फिर भी उसका भीतर अनुभव कैसे होता है ? (८)…
  27. Verse 30उक्त रीति से भले ही घट में ज्ञानरूप फल की उपपत्ति हो जाय, फिर भी हृदय के अन्दर घटाकार का…
  28. Verse 31श्रीराघव, तदनन्तर उस प्रकार आँखों के तारों में प्रविष्ट हुआ घटादि पदार्थ, हृदय में प्रतिब…
  29. Verse 32चेतन का अर्थ के साथ सम्बन्ध होने पर ज्ञान होता है, यह नियम बालक, पशु आदि में भी प्रसिद्ध…
  30. Verse 33दूरस्थ विषयों का इन्द्रिययोलकों के साथ सम्बन्ध कैसे होता है ? इस प्रकार की पामर शंका का न…
  31. Verse 34चक्षुरिन्द्रिय के विषय में कहे गये पूर्वोक्त क्रम का त्वगिन्द्रिय आदि में भी अतिदेश करते…
  32. Verse 35श्रोत्र द्वारा भीतर जीवाकाश में प्रवेश हो जाता है। (इसी रीति से गन्ध का भी पवन के द्वारा…
  33. Verse 36प्रसंगवश सभी प्रतिवि्म्बो का स्वरूप जानने की इच्छावाले श्रीरामभद्र पूछते है। श्रीरामचन्द्…
  34. Verse 37चैतन्य-प्रतिबिम्बभूत व्यष्टि-समष्टि रूप जीवों का भरान्तिमात्र से सिद्ध हुआ बिम्बातिरिक्त…
  35. Verse 38केवल प्रतिबिम्ब ही भ्रान्ति नहीं है, कितु जगत्‌ भी भान्ति है, यह कहते हैं। श्रीरामजी, यह…
  36. Verse 39परमचितिरूप समुद्र में तो देश, काल, क्रिया आदि सदा एकमात्र तद्रूप होने से पृथक्‌ है ही नही…
  37. Verse 40श्रीरामभद्र, सदा विषयासक्त बुद्धि से शून्य, प्रसन्नात्मा, हृदय में मिथ्याभूत सुखदुःख का अ…