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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

तदेव च प्रकृतितां गतं जगदवस्थितेः । तस्या अवयवाज्जातमिन्द्रियादि घटादि च ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

कहे गये अर्थ में मारयां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्‌ । अस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्‌ ॥ इस श्रुति को प्रमाणरूप से उपस्थित करते हैं। वही मायाशबल कल्पितरूप जगत्‌ के अवस्थान मेँ प्रकृति बन गया है । उसी प्रकृति के अवयवों से इन्द्रिय आदि प्रमाण एवं घट आदि प्रमेय उत्पन्न हुए है