Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verses 4–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, verses 4–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 4,5
संस्कृत श्लोक
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
विद्यमानमपि ब्रह्मन्दृश्यमानमपि स्फुटम् ॥ ४ ॥
कथं मृतस्य वै जन्तोर्विषयं स्वं न पश्यति ।
जीवतश्च कथं सर्वं विषयं स्वं प्रपश्यति ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि अर्थो के अनुभवों का उल्लेख सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में ही देखा जाता है (मेरे हृदय में
अमुक अर्थ का अनुभव हुआ' यों सभी प्राणी अपने-अपने अनुभवों का उल्लेख करते हैं, ऐसा दिखाई
पड़ता है), प्रियअप्रियदर्शनजनित युख-दु:खों का अनुभव हृदय में ही होता है और दीर्घकाल के अनुभूत
बाह्य विषयों का स्मरण भी हृदय में ही देखा जाता है; इसलिए यह कहना आवश्यक है कि बाह्य विषयों
का अनुभव हृदय में ही होता है। इस स्थिति में चक्षु आदि जितनी इन्द्रियाँ हैं, उनमें बाह्य स्थित अर्थो
को हृदय में लाने की शक्ति नहीं है, और वे स्वयं जड होने के कारण बाहर जाकर, अनुभव कर और
फिर लौटकर बाह्य अर्थो का वर्णन करने में समर्थ भी नहीं हैं; अतः चक्षु आदि के गोलको को छोडकर
इन्द्रियो का दूसरा स्वरूप मानना निरर्थक ही है। यहाँ पर यह मानना भी अयुक्त है कि अन्तःकरण से
अवच्छिन्न जीवचैतन्य ही इन्द्रिय द्वारा बाहर निकलकर, घट आदि बाह्य विषयों से सम्बद्ध होकर उन
बाह्य विषयों का अनुभव करेगा ? क्योकि ऐसा मानने पर मेरे हृदय में विषयानुभव हुआ” यह न कहकर
लोग ऐसा कहने लगेंगे कि मेरे बाहर विषयानुभव हुआ, इसी तरह प्रियअप्रियवर्शन प्रयुक्त
सुखदुःखानुभव भी हृदय से बाहर ही होगा और कालांतर में अनुभूत बाह्य विषयों का हृदय में स्मरण न
होकर बाहर ही होने लगेगा-जो सर्वथा विपरीत है, जब तक विषयों का हृदय में प्रवेश नहीं होगा तब
तक उनका हृदय के अंदर अनुभव हो ही नहीं सकता। यदि इस विषय पर यह कहें कि बाहर निकली हुई
अन्तःकरण वृत्ति विषयों के सम्बन्ध से विषयाकारता-लांछन, जिसका नाम संस्कार है, लेकर भीतर
प्रवेशकर, नट के सदुश विषयाकार का अनुकरण कर रही विषयों का अनुभव अथवा स्मरण कराती है,
तो यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योकि घटादि विष्यो का अनुभव यदि आपके कथनानुसार घटाकारक
संस्काररूप लांछन से युक्त होगा तो भ्रम ओर प्रमा दोनों में कोई भेद न हो सकने से सर्वत्र ज्ञानों में
विश्वास उठ जायेगा; और घट आदि विषयों में बाह्यत्व का जो अनुभव होता है, वह भी नहीं होगा । इन
सब तर्को से यह निष्कर्ष निकला कि अनुभव तो एक भीतरी पदार्थ है और घटादि बाहर के पदार्थ हैं, इन
दो वस्तुओं का परस्पर सम्बन्ध न हो सकने के कारण बाह्यार्थों को किसी भी तरह अनुभव पर चढ़ाया
नहीं जा सकता । इसीलिए नैयायिक आदि अनुभव का विषयों के साथ विषयविषयिभावरूप एक
स्वरूपसम्बन्ध मानते है, न कि संयोग आदिरूप; परंतु उनका यह पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योकि
विषयविषयिभावरूप स्वरूपसम्बन्ध किसी खास विषय के साथ सम्बद्ध तो है नही! सबके साथ समानरूप
है, इसलिए अमुक अनुभव में अमुक ही विषय है-इस प्रकार ज्ञान में विषयों की व्यवस्था नहीं हो सकती ।
इस पर यदि यह कहा जाय कि पहले आत्मा मन के साथ सम्बद्ध होता है, अनन्तर मन इन्द्रिय के साथ
सम्बद्ध होता है ओर फिर इन्द्रियाँ विषयों के साथ सम्बद्ध होती हैं" - इस क्रम से ज्ञानाअय- आत्म-
संयुक्तमन:संयुक्त-इन्द्रियसंयोग आदि रूप परम्परासम्बन्ध से ज्ञान में विषयव्यवस्था हो सकती है,
तो यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योकि इस प्रकार का परम्परासम्बन्ध अनुगत न होने के कारण स्मृति,
अनुमिति आदि में अनुगत तत्-तत् विषयों की व्यवस्था नहीं कर सकता। अपिच, यह परम्परासम्बन्ध
बाह्य अर्थो में अपरोक्षत्व सम्पादक है, फिर भी आप जब उसे विषयव्यवस्थापक मानते हैं तब तथाकथित
स्वरूपसम्बन्ध मानना व्यर्थ ही है। इसी युक्ति से सम्बन्ध द्वारा विषय जिस ज्ञान की अभिव्यक्ति करता
है, वही अर्थ उस ज्ञान का विषय होता है-यह बात भी खण्डित हो जाती है, क्योकि इन्द्रिय आदि जो भी
ज्ञानाभिव्यक्ति में हेतु हैं, वे सब उस ज्ञान के विषय हो जायेंगे। इसलिए अघटित घटना में समर्थ
मायाशक्ति की सामर्थ्य से ही हृदय में बाहर के विषयों का अनुभव होता है - यही कहना होगा; ऐसी
स्थिति में वश्च आदि गोलको को छोड़कर अतिरिक्त इन्द्रियों को मानने में फल ही क्या है ? अतः
अनुभवानुसार गोलक द्वारा ही चिदात्मा बाह्य अर्थो का अनुभव करता है, यही सिद्धान्त स्वीकृत होगा।
इस परिस्थिति में मृत देह में भी चश्च आदि गोलक एवं सर्वगतसदात्मा दोनों का अवस्थान रहने से वहाँ
भी चिदात्मा बाह्य अर्थो का अनुभव क्यो नहीं करता ? - यो श्रीरामजी शंका करते है ।
ब्रह्मन्, मृतप्राणी के शरीर में यद्यपि श्रोत्र-गोलक, चक्षर्गोलक, त्वग्गोलक, रसना-गोलक ओर
घ्राण-गोलक-सब विद्यमान और स्पष्ट दिखाई देते हैँ, फिर भी वे अपने-अपने विषयों का ग्रहण कैसे
नहीं करते और जी रहे प्राणी के शरीर में वे सब अपने-अपने विषयों का ग्रहण कैसे करते हैं ?