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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

चित्त्वस्य कलनान्तस्य संप्रयातस्य जीवताम् । मनःषष्ठेन्द्रियग्रामो देहोऽयमवतिष्ठते ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामभद्र, पुर्यष्टक में प्रतिबिम्बित होने के कारण परिच्छिन्न आकार से युक्त तथा जीवरूपता को प्राप्त हूए चैतन्य का मन के साथ छः इन्द्रियो से समन्वित यह शरीर नख के अग्रभागपर्यन्त व्याप्ति में परिमाता होकर स्थित रहता हे । उसी से जीवचैतन्य सर्वदा देहपरिमित होकर देह के अन्दर रहनेवाले सुख, दुःख आदि का सम्बन्धवश अनुभव करता हे, देह से बाहर रहनेवाले का नहीं