Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
बाह्यार्थवेदने नित्यं संबन्धोऽक्षस्य कारकः ।
समन्वितस्य चित्तेन न मुक्तस्य कदाचन ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी,
बाह्य विषयों के ज्ञान में इन्द्रियसन्निकर्षं ही सदा कारण है ओर वह इन्द्रियों का सम्बन्ध चित्त से युक्त
जी रहे पुरुष में ही संभव है, मृत अथवा मुक्त पुरुष में कभी नहीं