Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
पुर्यष्टकत्वमायातं यच्चित्तं स्वस्वभावतः ।
स्व एवावयवस्तस्मिन्घटादि प्रतिबिम्बति ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
इन्द्रियों द्वारा बाहर निकला हुआ पुर्यष्टकघटक चित्त पहले घटादि से सम्बद्ध होता है । बाद में
उस सम्बन्ध से हुई घटादि विषयाकार अपनी वृत्ति में प्रतिबिम्बित हुए घटादि को बाह्यत्वाकार से
ही हृदय मेँ ले जाकर वह उनका प्रदर्शन कराता है । उसी प्रकार कालान्तर में स्मरण होता है ओर
स्वप्न में भीतर स्थित वस्तुओं का ही बाह्यरूप से अनुभव होता है, यों सबकी उपपत्ति हो जा सकती
है; इस आशय से कहते है ।
इस प्रकार पुर्यष्टकरूपता को प्राप्त हुआ जो चिद्रूप तत्त्व है, वही अपने चित्त आदि से घटित
स्वभाव के कारण स्वयं ही चित्त वृत्ति नाम का अवयव हो जाता है । उस चित्तवृत्तिनामक अवयव में
घटादि बाह्य विषय बाह्याकार से ही प्रतिविम्बित होते हैं | मृत-देह में तो पुर्यष्टकघटित लिंग देहात्मक
जीव के अपनी कल्पना से ही लीलोपाख्यान में प्रदर्शित रीति के अनुसार बाहर निकल जाने के कारण
दर्शन आदि की सामर्थ्य ही नहीं रहती; यों सर्वविध विरोध का परिहार हो जाता है, यह भाव है