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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । जगत्सहस्रनिर्माणमहिम्नो दर्पणस्य च । पुर्यष्टकस्य भगवन्रूपं कथय कीदृशम् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि ऐसा ही है तो उस पुर्यष्टक का ही स्वरूप क्‍या है ? जो पंचीकृत भ्रूतांशरूप जगत्‌ के आकार मँ परिणत हो रहा है और अप॑चीकृत भूतो के कार्यरूप लिगाश से उनका प्रतिबिम्ब ग्रहण कर रहा एक तरह से दर्पणतुल्य है-वही कहिए, यों श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, हजारों जगत्‌ के निर्माण की महिमावाले और उन जगत्‌ के लिए दर्पणभूत उस पुर्यष्टक का स्वरूप किस प्रकार का है यह आप कहिए