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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

कश्चिद्विशुद्धजातित्वाद्भवबन्धादनन्तरम् । बुद्ध्वात्मानं समभ्येति पदमाद्यन्तवर्जितम् ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

सनक आदि के सदृश कोई तो विशुद्ध जाति के प्रभाव से कल्प के प्रारम्भ में ही यानी पूर्वकल्प के सांसारिक बन्धन के बाद प्रथम जन्म में ही आत्मा का तत्वतः ज्ञानकर आदि एवं अंत से शून्य परम पद को प्राप्त हो जाते हैं (~)