Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
ज्ञत्वकर्तृत्वभोक्तृत्वसाक्षित्वाद्यभिपातिनी ।
या संविज्जीव इत्युक्ता तद्धि पुर्यष्टकं विदुः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
(७) अध्यासवश
ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, साक्षित्व आदि धर्मो से युक्त (ज्ञानेन्द्रियों के व्यापारो से मैं ज्ञाता हू,
कर्मेन्द्रियों के व्यापारों से “भे कर्ता हू, उन ज्ञान कर्मेन्द्रियों के व्यापारो से जनित सुख-दुःखों का
आश्रय होने से “मे भोक्ता हू, उदासीन होकर सबका प्रकाशन करने से “मे साक्षी हूँ” इत्यादि
अभिमानयुक्त) जो चैतन्य है, वही चैतन्यांश की प्रधानता से "जीव" कहा गया है ओर जडांश की
प्रधानता से उसे ही विद्वान् लोग 'पुर्यष्टक' भी कहते हैं