Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
गगनादपि याऽच्छा चित्तया रूपं स्वमात्मना ।
चित्त्वात्पुर्यष्टकत्वेन भाववृत्त्यैव भावितम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कल्पना द्वारा द्रष्टा ओर दृश्य की उपपत्ति मानते हो तो इन्द्रिय आदि से घटित पुर्यष्टकरूप से
भी पूर्वपूर्वं वासनाओ के अनुसार चित्स्वरूप की कल्पना युक्त हो जायेगी, ऐसी स्थिति में किसी
प्रकार की अनुपपत्ति नहीं रह जाती, इस आशय से कहते हैं।
गगन से भी अत्यन्त निर्मल जो चिति है, उसने चित् होने के कारण मायाशबल-स्वभाव
इन्द्रियादिघटित पुर्यष्टकरूप से अपने स्वरूप की पूर्व पूर्व वासनाओं के अनुसार कल्पना की है