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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

यद्यदच्छतरं तस्मिन्नभःस्थं प्रतिबिम्बति । जीवेन भवति श्लिष्टो बहिर्जीवोऽप्यजीवति ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

बाहर ऐसा ही होता है, यह हम मान लेते हैं, परंतु फिर भी उसका भीतर अनुभव कैसे होता है ? (८) ये सब प्रकार के विभाग (भेद) उत्पत्ति प्रकरण के सात्विक, राजस आदि जीवों के भेद- वर्णन -प्रसंग में विस्तृतरूप से कहे जा चुके हैं । यदि ऐसी शंका हो, तो उस पर कहते हैं। अन्तःकरणवृत्तिरूप या नयनरश्मरूप जो-जो अत्यंत स्वच्छ वस्तु है, उसी में बाह्याकाश में स्थित घटादि विषय प्रतिबिम्बित होते हैं, और वह प्रतिबिम्ब अन्तःकरणवृत्ति के अन्तर्गत जीव चैतन्य के साथ संश्लिष्ट हो जाता ह । (तव बाहर स्थित हुआ ही मैं घट का साक्षात्कार करता हूँ यों सव लोग क्यो अनुभव नहीं करते ? इस पर कहते हैं ।) यद्यपि जीव बाहर विद्यमान है; तथापि वह बाहर प्राणों को धारण नहीं करता | तात्पर्य यह हुआ कि जहाँ प्राण की व्याप्ति रहती है, वहीं अहन्ताभिमान होता है, बाहर नहीं