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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

यत्संश्लेषमुपायाति तद्बालोऽपि हि विन्दति । पशुर्वा स्थावरो वापि जीवः कस्मान्न वेत्स्यति ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

चेतन का अर्थ के साथ सम्बन्ध होने पर ज्ञान होता है, यह नियम बालक, पशु आदि में भी प्रसिद्ध है, यह कहते हैं। जो वस्तु सम्बन्ध को प्राप्त होती है, उसे बालक भी अथवा पशु भी जान लेता है। किं बहुना ? जब स्थावर पदार्थ (७) भी अपने साथ सम्बद्ध वस्तु को जान लेता है तब जीव अपने से सम्बद्ध वस्तु को क्यों नहीं जान लेगा ?