Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
यदान्यः सर्वदेहेभ्यः खे पतत्यक्षरूपिणा ।
तदा तज्जीवसंस्पर्शाज्जीवात्मैकत्वमृच्छति ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
जब आन्तर वस्तुओं से अन्य
बाह्य घट आदि पदार्थो का प्रत्यक्ष करना होता है तव तालाब से झटके से उछला हुआ जल नाली द्वारा
क्यारियों में जिस प्रकार पहुँचता है, उसी प्रकार सब देहो से उद्रिक्त हुआ जीवचैतन्य चक्षु आदि
इन्द्रियरूप द्वारो से घटादिपर्यन्त बाह्यविषय तक के आकाश में जाता हे । उस स्थिति में उन घटादि
विषयों का नेत्र आदि द्वारो से निकले हुए जीवचैतन्य के साथ स्वाकारवृत्तिव्याप्ि द्वारा सम्बन्ध हो जाने
से वे विषयता (जीवचैतन्य के साथ अध्यासजनित चित्तादात्म्य) प्राप्त करते हैं