Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
एष एव क्रमः स्पर्शे संबन्धः प्रत्ययोद्भवः ।
रसे गन्धे च कथितो जीवसंस्पर्शसंभवः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
चक्षुरिन्द्रिय के विषय में कहे गये पूर्वोक्त क्रम का त्वगिन्द्रिय आदि में भी अतिदेश करते हैं।
त्वगिन्द्रिय आदि स्थल में जीव संरपर्श से होनेवाला यह पूर्वोक्त प्रकार ही स्पर्श, रस और गन्ध का
परिज्ञान कराने में सम्बन्ध यानी हेतु कहा गया है