Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 85
तिरासीवाँ सर्ग समाप्त चौरासीवोँ सर्म वीतहव्य महामुनि की समाधि का, पृथ्वी के विवर में स्थिति का तथा उसके हृदय में विद्याधरत्व, इन्द्रत्व,गणत्व आदि के अनुभव का वर्णन ।
36 verse-groups
- Verse 1वसिष्ठजी ने कहा : भद्र उस प्रकार निर्णय कर वह मुनि वीतहव्य समस्त वासनाओं को छोड़कर विन्ध्…
- Verse 2उस समय महामुनि वीतहव्य किसी प्रकार के क्षोभ से शून्य परिपूर्ण संवित् प्रकाशरूप आनन्द युक…
- Verse 3इस महामुनि का क्रमश: प्राणसंचार भीतर हृदय में ही उस प्रकार शान्त हो गया, जिस प्रकार इन्धन…
- Verse 4महामुनि वीतहव्य के, अर्धउन्मीलित नेत्रों का वर्णन करते हैं। महामुनि वीतहव्य के चंचलताशून्…
- Verse 5महामुनि वीतहव्य के दोनों नेत्र ऐसे लक्षित होते थे मानों उनका स्वल्पसे भी स्वल्प प्रकाश ना…
- Verse 6महाबुद्धि वीतहव्य ने अपने आसनबन्ध में शरीर, शिर और ग्रीवा को समानरूप से रक्खा था, इसलिए व…
- Verse 7श्रीरामजी, विन्ध्याद्रि के किसी झरने के समीपस्थ प्रदेश के कोटर में उस प्रकार की समाधि का…
- Verse 8आत्मवान् ध्याननिमग्न उस मुनि ने जीवन्मुक्तता के कारण इतने काल को कुछ भी नहीं समझा ओर अपन…
- Verses 9–13योग के रहस्य को जाननेवाले परमभाग्यशाली वह मुनि महान् मेघों के चारों ओर फैलनेवाले शब्दों…
- Verses 14–15बरसने पर थोडे ही समय में उक्त पर्वत की कन्दरा में वर्षा के ओघ से भी प्राप्त हुए कीचड़ ने…
- Verse 16जिसके भीतर अनेक संकट भरे पड़े थे, ऐसे उक्त कोटर की भूमि में यह मुनि कीचड़ से संश्लिष्ट कन…
- Verse 17तदनन्तर तीन सौ वर्षो के बीत जाने पर पृथ्वी के कोटर में संश्लिष्ट वे स्वयं ही निग्रहानुग्र…
- Verse 18उस प्रकार संकटों के बीच मे रहनेवाले उक्त मुनि का जीवन कैसे रहा ? इस पर कहते है । इस महामु…
- Verse 19तीन सौ वर्षो के बाद उनका जो व्यवहार रहा, उसे कहते हैं। तीन सौ वर्षो की समाधि के अनन्तर उस…
- Verse 20उन्होनें जिसका अनुभव किया, उसे ही कहते है। कमनीय केलास पर्वत के कानन में एक कदम्बवृक्ष के…
- Verse 21सौ वर्षो तक उन्होने मानसी व्याधि से वर्जित विद्याधरत्व का अनुभव किया ओर पाँच युगो तक देवत…
- Verse 22श्रीरामजी ने कहा : हे मुने, उन इन्द्रत्व आदि के अनुभवों में देश ओर काल का नियम ओर अनियम क…
- Verse 23असवत्मिकत्वरूप से ज्ञात चिति मे स्वल्प-देश और काल में अन्य विस्तृत देश और काल की कल्पना क…
- Verse 24अपनी बुद्धि से अनुभूयमान देशकाल में ही संकोच और वैयुल्य के नियम ओर अनियम परस्पर विरुद्ध ह…
- Verse 25उन्हीं दो हेतुओं से समस्त वासनाओं से वर्जित इस महामुनि वीतहव्य ने हृदयस्थ संविदाकाश में अ…
- Verse 26हे श्रीरामजी, सम्यक् ज्ञानवान् पुरुषों की यह वासना (देवराजत्व आदि अनुभव की हेतु वासना)…
- Verse 27महामुनि वीतहव्य ने एक कल्प तक चन्द्रमौलि महादेवजी के गणता यानी शिवजी के गणों की स्वामिता…
- Verse 28जीवन्मुक्त भी उस मुनि के भोगप्रद प्रारब्ध कर्मो से उद्बोधित दृढ़ संस्कार ही विलक्षण देहभो…
- Verse 29श्रीरामजी ने कहा : हे मुनिवर, ऐसी स्थिति होने पर तो जीवन्मुक्त पुरुष के अन्तःकरण में भी ब…
- Verses 30–31दग्धपट के दृष्टान्त से असत् पदार्थ का प्रारब्ध शेष से प्रतिभास बाधित की अनुवृत्तिमात्रस्…
- Verse 32जिस जिस स्थल में जिस जिस प्रकार से संविद्रूपी आकाश भासता है उस उस स्थल मे उस-उस प्रकार से…
- Verses 33–34महामुनि वीतहव्य का हृदय (हृदय से उपलक्षित आत्मा) हम लोगों के समस्त आत्माओं के स्वरूपभूत थ…
- Verse 35पितामह के पाद्यकल्प के समय, जबकि मुनि वीतहव्य शिवजी के गणों के अधिपति थे, उनकी क्रीडा के…
- Verse 36इसी प्रकार उस समय पृथ्वी के सौराष्ट् प्रदेश में जो आत्मज्ञान से रहित राजा था, वही आज आन्…
- Verses 37–38गुरु महाराज वस्रिष्ठजी की उक्ति का अभिप्राय स॒र्वात्मता के प्रतिपादन में है, इसको न समझ र…
- Verse 39महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, महामुनि वीतहव्य का वह जगत् यदि केवल भ्रान्तिस्वरू…
- Verse 40हे श्रीरामजी, वास्तव में तो वह (मुनि वीतहव्य का) जगत् न तो आपके इस जगत् के सदुश है और न…
- Verse 41जैसे यह भूत, भविष्यत् ओर वर्तमान् जगत् है, वैसे ही दूसरा भी जगत् हे । समस्त दृश्यभूत…
- Verse 42हे श्रीरामजी, जब तक इस प्रकार के जगत् को संविन्मात्र स्वरूप नहीं जान लेते, तब तक वह वज्र…
- Verse 43अज्ञान से यह मन ही उत्पत्ति और वृद्धि आदि परिणामों से जगत् के रूप में ऐसा विकसित होता है…
- Verse 44हे श्रीरामजी, अविकृत चिदाकाश स्वभाव से अवस्थित ब्रह्म माया से “मेँ किसी को मानों चेतन करन…