Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 44
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, अविकृत चिदाकाश स्वभाव से अवस्थित ब्रह्म माया से “मेँ किसी को मानों चेतन
करनेवाला हू यों अपनी कल्पना कर चित्तरूप हो जाता है, तदनन्तर उसी का पुनः पुनः मनन करने से
मन नामवाला हो जाता है । उसीसे यह विशाल जगत् प्राप्त हुआ हे, इसीलिए इस प्रकार यह दृश्य जगत्
विस्तृत हे । वास्तव में कुछ भी विस्तृत नहीं है