Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

नभस्तलपरिभ्रान्तो विहङ्गम इवालयम् । प्रणेमतुर्मिथो मूर्तवीतहव्यनभश्चरौ ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

अपनी बुद्धि से अनुभूयमान देशकाल में ही संकोच और वैयुल्य के नियम ओर अनियम परस्पर विरुद्ध होते है, पर अनअनुभूयमान के साथ अनुभूयमान के वे विरुद्ध नहीं होते, क्योकि अत्यन्त अल्प नाड़ी छिद्रों मे स्वल्प समय में ही विस्तृत देश-कालवाले स्वप्न का अनुभव होता है, इस आशय से कहते हैं । जहाँ पर जिस समय बुद्धि में जिस प्रकार का अनुभव होता है, वहाँ पर उस समय वैसा नियम रहता है, क्योंकि देश, काल आदि के नियमों के क्रम बुद्धिमय आत्मा में अध्यस्त हैं