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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । अथ किं वीतहव्यः स्वं स्थितं तस्मिन्धरोदरे । कथमुद्धृतवान्देहं स संपन्नश्च किं कथम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

वसिष्ठजी ने कहा : भद्र उस प्रकार निर्णय कर वह मुनि वीतहव्य समस्त वासनाओं को छोड़कर विन्ध्याद्रि के गह्वर कोटर में समाधि लगाकर उसमें अटल रहे

सर्ग सन्दर्भ

तिरासीवाँ सर्ग समाप्त चौरासीवोँ सर्म वीतहव्य महामुनि की समाधि का, पृथ्वी के विवर में स्थिति का तथा उसके हृदय में विद्याधरत्व, इन्द्रत्व,गणत्व आदि के अनुभव का वर्णन ।