Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verses 30–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 30
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
दग्धपट के दृष्टान्त से असत् पदार्थ का प्रारब्ध शेष से प्रतिभास बाधित की अनुवृत्तिमात्रस्वरूप है,
बन्ध-स्वरूप नहीं है, इस आशय से कहते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, जीवन्मुक्तो की दृष्टि में जिस प्रकार का यह जगत् विद्यमान
हे, वह प्रशान्त, आकाश की नाई अत्यन्त निर्मल ब्रह्मस्वरूप ही है फिर उनको बन्ध ओर मोक्ष की
दृष्टियाँ कैसे हो सकती हैं