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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 32

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जिस जिस स्थल में जिस जिस प्रकार से संविद्रूपी आकाश भासता है उस उस स्थल मे उस-उस प्रकार से उतने उतने रूपों में व्याप्त होकर वह प्राप्त-सा हो जाता है ॥ ३ १॥ जैसे ईश्वर को हमारे जगत्‌ का प्रतिभास बन्धन का हेतु नहीं होता है, वैसे ही मुनि वीतहव्य को भी तत्‌-तत्‌ स्वरूप का अनुभव बन्धन का हेतु नहीं हुआ, इस आशय से कहते हैं। हे राघव, महामुनि वीतहव्य ने सब भूतो मे आत्मभाव होने के कारण अनेक लोकों का ब्रह्मरूप से अनुभव किया ओर वर्तमान समय में कर भी रहे हैं