Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verses 9–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, verses 9–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 9-13
संस्कृत श्लोक
मुक्तश्चलितुमाकर्तुं शक्नोति न मनागपि ।
तज्ज्ञात्वा प्रविशाम्याशु देहमेवं विवस्वतः ॥ ९ ॥
तदीयः पिङ्गलो देहमुद्धरिष्यति मे ततः ।
अथवा किं ममैतेन शाम्याम्यहमविघ्नतः ॥ १० ॥
निर्वामि स्वं पदं यामि कोऽर्थो मे देहलीलया ।
इति संचिन्त्य मनसा वीतहव्यो महामते ॥ ११ ॥
तूष्णीं स्थित्वा क्षणं भूयश्चिन्तयामास भूतले ।
उपादेयो हि देहस्य न मे त्यागो न संश्रयः ॥ १२ ॥
यादृशो देहसंत्यागस्तादृशो देहसंश्रयः ।
तद्यावदस्ति देहोऽयं न यावदणुतां गतः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
योग के रहस्य को जाननेवाले परमभाग्यशाली
वह मुनि महान् मेघों के चारों ओर फैलनेवाले शब्दों से भी; बरस रही वृष्टि की धाराओं के सम्पात से
जनित घरघर शब्दों से भी, शिकार खेलने के समय आये हुए समीपस्थ प्रदेशों में रहनेवाले सामन्तो के
मतवाले हाथियों के गर्जनों से भी, पक्षी और वानरों की किलकिलाहटों से भी, जंगल के हाथियों मातंगों
के (परस्पर संघट्टन से जनित) अव्यक्त शब्दों से भी, सिंहों के क्रोधपूर्वक गर्जनों से भी, झरनों की
दिग्व्यापी घर्घराहट ध्वनि से भी, भयंकर वज़पातों से भी, मनुष्यों के घन कोलाहलों से भी, प्रमत्त गेंडों
के भयंकर शब्दों से भी, भूकम्प के द्वारा छिन्न भिन्न हुए पर्वत-तटों के आस्फालनों से भी, वन दाहो के
समय अग्नि के संयोग और उससे उत्पन्न शब्दों से भी, जल-प्रवाहों से आहत पशु आदि के आस्फालनों
एवं गर्जनों से भी, बड़े-बड़े पर्वत तटों के आघातों से भी, जलप्रवाहों के आन्दोलन से प्राप्त धरणीतल
से फिसले हुए मिट्टी से मिले जल के शैत्य से भी तथा अग्नि की नाई कर्कश ग्रीष्म आदि के तापों से भी,
उतने समय तक समाधि से जागे नहीं