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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 39

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, महामुनि वीतहव्य का वह जगत्‌ यदि केवल भ्रान्तिस्वरूप ही आपको मालूम पड़ता है, तो फिर आपका यह प्रसिद्ध जगत्‌ किस हेतु से यथार्थरूप से भासित हो सकता है ? तात्पर्य यह हुआ कि सम्पूर्ण जगत्‌ मन ही का कार्य और केवल भ्रान्तिस्वरूप ही है, यह तत्‌-तत्‌ स्थल में अनेक बार कहा गया है, इसलिए यह आपका प्रसिद्ध जगत्‌ वीतहव्य की मानसी सृष्टि के सदृश भ्रान्तिमात्र स्वरूप ही ठहरा, ऐसी स्थिति में आप ही बतलाइए कि आपका भी यह जगत्‌ चेतनों से भरा कैसे प्रतीत हो रहा है ? ॥३ ८॥ दोनों सृष्टियों की समानता बतलाते है । हे श्रीरामजी, आपका यह जगत्‌ भी मनोमय भ्रमतुल्य एवं परमार्थ दशा में जिस प्रकार से चिन्मात्रस्वरूप है, उसी प्रकार से महामुनि वीतहव्य का भी वह जगत्‌ मनोमय, भ्रमतुल्य एवं परमार्थ- दशा में व्योमरूपी चिन्मात्रस्वरूप है