Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verses 37–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 37
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
गुरु महाराज वस्रिष्ठजी की उक्ति का अभिप्राय स॒र्वात्मता के प्रतिपादन में है, इसको न समझ रहे
मनुष्यों को, उनकी शंका के उद्घाटन द्वारा गुरुमुख से ही बोध करानेवाले श्रीरामजी पूछते हैं।
श्रीरामजी ने कहा : गुरुवर, मुनि वीतहव्य की यह सृष्टि तो मानससृष्टि है, उस सृष्टि में विद्यमान
देही यदि भ्रान्ति स्वरूप है, तो वे इन्द्र, हंस आदि देहों के आकारवाले चेतन युक्त कैसे हुए ?