Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
तृणोपलपरिच्छन्नं ददर्श गतसंविदम् ।
ऋषेश्चिकीर्षितं ज्ञात्वा भानुर्गगनमध्यगः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
उस प्रकार संकटों के बीच मे रहनेवाले उक्त मुनि का जीवन कैसे रहा ? इस पर कहते है ।
इस महामुनि वीतहव्य की पृथ्वी से दवी हुई देह को जीवनादृष्ट से प्राप्त लिंग शरीर में प्रतिबिम्बित
संवित् ने ही ग्रहण कर पालन किया, प्राण -वृत्तिरूप स्पंदन ने पालन नहीं किया, क्योकि वह सूक्ष्म था,
इसलिए प्राण-संसरण नहीं हो सकता था