Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 85, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
पङ्कपल्वललीलान्ते वने कलभको यथा ।
तत्र स्नात्वा जपं कृत्वा पूजयित्वा दिवाकरम् ।
मनोभूषितया तन्वा पूर्ववत्पुनराबभौ ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
महामुनि वीतहव्य ने एक कल्प
तक चन्द्रमौलि महादेवजी के गणता यानी शिवजी के गणों की स्वामिता की, जो शेष विद्याओं में निपुण
और तीनों कालों में ज्ञानपूर्ण थी