Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 74
बहत्तरवाँ सर्ग समाप्त तिहत्तरवाँ सर्ग दो तरह की अहंभावना ग्रहण करने योग्य है, तीसरी अहंभावना त्याग करने योग्य है, तीनों अहंभावनाओं के त्याग से मुक्ति की इच्छा नहीं होती, यह कथन ।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे चिन्तामणि के स्वरूप को जाननेवाले देवता चिन…
- Verse 2सर्वत्र अहंभाव-द्ृष्टि को बतलाने के लिए उपक्रम करते है । हे श्रीरामजी, अब आप इस द्वितीय द…
- Verses 3–4मैं आकाश हूँ, मैं आदित्य हूँ, मैं दिशाएँ हू मेँ अधः हूँ, मै ऊर्ध्व हूँ, मैं दैत्य हूँ, मै…
- Verse 5सर्वात्मक स्वरूप से भिन्न परिच्छिन्न मेँ कोन हूँ ? अर्थात् मैं कभी परिच्छिन्न नहीं हो सक…
- Verse 6हे रामजी, यों विचारकर आप निश्चयात्मक ज्ञान से युक्त हो जाइये, तदनन्तर आत्मा के भीतर रहनेव…
- Verse 7हे कमलनयन पापशून्य श्रीराघव, इस समस्त जगत् के आत्मस्वरूप से अवस्थित हो जाने पर क्या अपना…
- Verse 8तत्त्वज्ञ से भिन्न ऐसी कोन वस्तु है, जो उसे यदि प्राप्त हो जाय तो वह तन्निबन्धन हर्ष ओर व…
- Verse 9ये आगे कही जानेवाली दो अहंकार की दृष्टिर्यो सात्विक और अत्यन्त निर्मल हैँ, उनकी तत्त्वज्ञ…
- Verse 10हे रघुकुलतिलक उन दो अहंकार -दृष्टियो में पहली सबसे परे आकाश की नाई स्थूल स्वभाव वर्जित, ज…
- Verse 11हे पापशून्य रामजी, इन दो से पृथक् एक तीसरी अहंकारदृष्टि स्वभावतः ही , न कि शास्त्रतः चली…
- Verse 12अब आप इन तीनों अहंकारो को भी छोडकर जो अवशिष्ट रहनेवाला अहंभावनाशून्य पूर्ण चित्स्वभाव है,…
- Verse 13यद्यपि आत्मा शोधन द्वारा अखिल प्रपंच स्वरूप से निर्मुक्त तथा बाध के द्वारा समस्त पदार्थो…
- Verse 14युक्ति, शास्त्र ओर गुरुवचन ये तो केवल दिशामात्र का सूचन करने के लिए हैं, उसका परिचय तो के…
- Verse 15"तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि" (उपनिषद के प्रमाण- गम्य उस पुरुष के विषय में पूछता हूँ) इ…
- Verse 16सबको आत्मा प्रत्यक्ष है, इसका उपपादन करते हैं। बाह्य ओर आन्तर विषयों में अन्तःकरणकी वृत्त…
- Verse 17आत्मा प्रत्यक्ष ओर परोक्ष वेद्य, व्यक्त एवं अव्यक्त दोनों से विलक्षण है, इस कथन से दृश्य…
- Verse 18इस प्रकार वाग् आदि कर्मेन्द्रियों की प्रवृत्ति मेँ निमित्त होने के कारण वागादि से व्यवहृ…
- Verse 19आत्मा ओर अनात्मा, यह नामरूप जो विभाग है, उसकी भी उसी आत्मा ने अपनी ज्ञानशक्ति से यानी माय…
- Verses 20–21हे श्रीरामजी, वह प्रकाशमान परमात्मा तीनों कालों में सब जगह अवस्थित हे, वह यद्यपि सदा नित्…
- Verse 22स्थूल-विषर्यो की आसक्ति में तो मोहवश पूर्यष्टकरूप उपाधि में (पाँचभूत, कर्म, वासना और विद्…
- Verse 23जैसे सब पदार्थो का अस्तित्व सर्वत्र विद्यमान है, वैसे ही महेश्वर चित्स्वरूप परमात्मा भी स…
- Verse 24परिच्छिन्न अहंस्वरूप से परमात्मा के स्फुरण में तो पुर्यष्टक हेतु है, ऐसा कहते है । जैसे व…
- Verse 25जैसे आकाश में सूर्य के रहने पर ही सब मनुष्यों को तत्-तत् क्रिया से होनेवाले फलों की अभि…
- Verse 26यद्यपि आत्मा सव व्यवहारो से दूर है, तो भी (आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति" इत्यादि श्रु…
- Verse 27स्वप्रकाश स्वरूप आत्मा के अवस्थित होने पर आत्मसत्ता से अपनी स्थिति को प्राप्त करनेवाली दे…
- Verse 28तब आत्मा का स्वाभाविक स्वरूप कैसा है ? तो उस पर कहते हैं। सबका यह आत्मा किसी समय न तो उत्…
- Verse 29इसलिए आत्मा को अज्ञान से ही अनर्थ की भ्रान्ति हुई है, यह कहते हैं। आत्मा के प्रबोध से उत्…
- Verse 30प्रबोध होने पर आत्मा किस प्रकार का रहता है ? उसे कहते है । यह आत्मा कभी भी उत्पन्न नहीं ह…
- Verse 31यह आत्मा दिशा या काल से परिच्छिन्न नहीं है , अतः कभी यह बद्ध नहीं होता, जब बन्ध ही नहीं ह…
- Verse 32हे राघव, मैंने पहले जो आत्मा के गुण बतलाये हैं, उन गुणों से युक्त ही यह आत्मा सबका हे, इस…
- Verse 33हे सुमते, मेरे वचनो से आपने जगत् की पूर्वापर रचना का निःशेषरूप से भली-भाँति परिज्ञान कर…
- Verse 34जैसे गेहूँ आदि को पीसने के लिए विनिर्मित जल-चक्की आदि यन्त्र के द्वारा गेहूँ आदि का पीसना…
- Verse 35मोक्ष न तो आकाश की पीठ के ऊपर है, न तो पाताल में है और न भूमि के तल पर है, किन्तु सम्यक्…
- Verses 36–38इच्छा करने योग्य विषयों मे अनासक्ति करने से अन्तःकरण का जो बोधात्मक वृत्ति से स्वयं क्षय…
- Verse 39हे श्रीरामजी, जब तक निर्मल आत्मा का प्रबोध उदित नहीं हुआ है, तब तक मूर्खतायुक्त कार्पण्य…
- Verses 40–91हे श्रीरामजी, समस्त कल्पनाएँ जिसमें से निर्मूल हो गई है, ऐसी अवस्था को प्राप्त होकर आप सग…