Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
अज्ञतैषा मनोमत्तमृगं विषयतर्षुलम् ।
असत्यैव हि सत्येव मृगतृष्णेव कर्षति ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार वाग् आदि कर्मेन्द्रियों की प्रवृत्ति मेँ निमित्त होने के कारण वागादि से व्यवहृत न होनेवाले
आत्मा का परिचय देकर अब वागादि और उनके (वागादि के) विषयों का उसमें बाध करके उसीका
परिशेष करना चाहिए, इस आशय से कहते है।
आत्मा ही इस प्रकार बोलता हे, परन्तु वह कहा नहीं जा सकता। ये वाक् आदि ओर उनसे व्यवहृत
होनेवाले पदार्थ आत्मा से अन्य नहीं है, हे रामजी, आप आत्मा को अनामय (अविकारी) ही देखिए