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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

नास्त्यविद्येति संजाते निश्चये शास्त्रयुक्तितः । गलत्यविद्या तापेन तुषारकणिका यथा ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

स्थूल-विषर्यो की आसक्ति में तो मोहवश पूर्यष्टकरूप उपाधि में (पाँचभूत, कर्म, वासना और विद्या इन आठ वस्तुओं से बने हुए लिंग शरीर में) प्रतिबिम्ब पड़ने से आत्ा की जायमान जीवभावापत्ति निमित्त है, इस आशय से कहते हैं। सर्ग के क्रम से उत्पन्न भोग्य ओर भोगायतन आदि अनेक पदार्थ मे पुर्यष्टकरूपी दर्पण में अपनी मायावश स्वतः आत्मा ही जीवरूप से प्रतिबिम्बित होता हे ।२१॥ जैसे पंखे आदि के संयोग से आकाश में सर्वदा सर्वत्र स्थित वायु अभिव्यक्त किया जाता हे, वैसे ही पुर्यष्टक के उदय से ही सदा सर्वत्र स्थित स्वयं आत्मा "अहम्‌ इस रूप से अभिव्यक्त किया जाता हे