Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
चित्ताहंकारयोर्द्वित्वं वचस्यस्ति न वस्तुतः ।
यच्चित्तं स ह्यहंकारो योऽहंकारो मनो हि तत् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्वात्मक स्वरूप से भिन्न परिच्छिन्न मेँ कोन हूँ ? अर्थात् मैं कभी परिच्छिन्न नहीं हो सकता हूँ । देहादि
भी मुझसे भिन्न कौन हैं ? एक अद्वितीय वस्तु में द्वित्व (स्वरूपगतभेद) किस प्रकार हो सकता है ?