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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verse 26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

शोभते परया लक्ष्म्या शरदीव नभस्तलम् । आत्मन्येव न मात्युच्चैः कल्पस्यान्त इवार्णवः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि आत्मा सव व्यवहारो से दूर है, तो भी (आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति" इत्यादि श्रुति से आत्मा ही प्रिय ओर अप्रिय का निवहिक है, यह भाव है। वैसा भले ही हो, उससे क्या हुआ ? इस पर कहते हैं। आकाश में सूर्य स्थित होने पर तत्‌-तत्‌ इच्छाफल में अनुरूप स्थिति रखनेवाला यह व्यवहार यदि विनष्ट हो जाता है, तो उससे सूर्य में क्या आया ? अर्थात्‌ कुछ नहीं