Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
तत्र कोऽयं मुधा मोहो भवतामतिदुःखदः ।
अयं सोऽहं ममाङ्गानि ममेदं चेति दुर्धियाम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
"तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि" (उपनिषद के प्रमाण- गम्य उस पुरुष के विषय में पूछता हूँ) इत्यादि
श्रुति से यह ज्ञात होता है कि धमधिर्म के सदश श्रुति और श्रुत्युक्त युक्तयो में केवल विश्वास रखने से
ही अलौकिक आत्मा का परिज्ञान होता है, ऐसी स्थिति में आप यह कैसे कहते हैं कि आत्मा केवल अपने
अनुभव से ही वेद्य है ? तो उस पर कहते है ।
हे श्रीरामजी, आत्मा न तो अनुमान से (युक्ति से) स्फुट होता है ओर न आप्त वचन आदि से स्फुट
होता है, किन्तु वह सर्वदा सब प्रकार से केवल अनुभव से ही प्रत्यक्ष यानी स्फुट होता हे । धर्म आदि के
समान अत्यन्त परोक्ष आत्मवस्तु का प्रतिपादन करने के लिए श्रुति आदि की प्रवृत्ति नहीं है, किन्तु
सबके अनुभव से सिद्ध सत्तावाले आत्मा का विवेचन करने के लिए ही उनकी प्रवृत्ति हे