Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 12
ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त बाहरवाँ सर्ग राजा जनक की जीवन्मुक्तिरूप से स्थिति का ओर विचार तथा प्रज्ञा के विचित्र महात्म्य का विस्तार से वर्णन |
25 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे वत्स, वहाँ अपने राज्य में इस प्रकार विचार कर रहे धीरमति राजा जनक…
- Verses 2–4केवल सुषुप्ति के समान निर्विक्षेपरूप से सदा स्थित रहा । तब से लेकर उन्होने न तो दृश्य का…
- Verses 5–6राजा जनक का अपरिच्छन्न ब्रह्माकार सम्यक् ज्ञान अत्यन्त निर्मल हो गया । जैसे आकाश में सूर…
- Verse 7अनन्त आत्मावाले, सब भूतों के आत्मा के भिज्ञ उन्होंने सब पदार्थो को चिदात्मा में अध्यस्त अ…
- Verses 8–10वे न तो कहीं पर विशेषरूप से हर्षित हुए ओर न कहीं पर दुःखी हुए । माया के सर्वव्यवहाररूप हो…
- Verses 11–14मानसिक गुण ओर दोषों के व्यापार से न तो स्वरूप के तिरोधानरूप अस्त को प्राप्त होते थे और न…
- Verse 15हे कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी, एकमात्र अपने विचार से ही राजा जनक को प्राप्तव्य परम ब्रह्मरूप…
- Verse 16जब तक फल की प्राप्ति न हो, तब तक विचार का त्याग नहीं करना चाहिये, ऐसा कहतेर्है। तब तक अपन…
- Verse 17सन्तो की संगति से निर्मलतारूप अभ्युदय को प्राप्त हुए, विचार से विशद चित्त से जो परम पद प्…
- Verse 18हे श्रीरामचन्द्रजी, सत् शास्त्रों के अभ्यास और विचार से परिष्कृत तथा ऊहापोह में कुशल- अन…
- Verse 19जिस पुरुष की पूर्वापर का विचार करनेवाली, कुशाग्र प्रज्ञारूपी दीपशिखा जलती है, उसे कभी भी…
- Verse 20हे महामते, जो विपत्तियाँ दुस्तर हैं और दुःखरूपी महातरगों से भरी हैं, उन आपत्तिरूपी नदियों…
- Verse 21जैसे कोमल वायु की लहर असार तृण को लथेड देती है वैसे ही प्रज्ञा से रहित मूढ पुरुष को छोटी-…
- Verse 22हे शत्रुतापन, प्रज्ञावान पुरुष के चाहे गुरू आदि सहायक न हों, शास्त्राभ्यास भी उसने न किया…
- Verse 23लोक में भी प्रज्ञावान मन्त्री आदि की अन्यबल से युक्त पुरुष की अपेक्षा प्रबलता प्रसिद्ध ही…
- Verse 24कोई कहे कि प्रज्ञा जब ऐसी वस्तु है, तब उसे किस उपाय से प्राप्त करना चाहिये ? इस पर कहते ह…
- Verse 25जैसे चन्द्रमा का मण्डल संसार के अन्धकार को दूर करनेवाली चाँदनी को उत्पन्न करता है वैसे ही…
- Verse 26बाह्य पदार्थों के अर्जन में लोग जैसे उद्योग करते हैं, प्रज्ञा की अभिवृद्धि के लिए पहले वै…
- Verse 27बुद्धि की मंदता, जो सब दुःखों की सीमा है, आपत्तियों का उत्तम भण्डार है और संसाररूपी वृक्ष…
- Verse 28इसी प्रकार प्रज्ञाकोश भी सब सम्पत्तियों की चरम सीमा है, ऐसा दिखलाते हैं। स्वर्ग से जो सुख…
- Verse 29आत्यन्तिक दुःखक्षय भी एकमात्र प्रज्ञा का ही फल है, ऐसा कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, भयंक…
- Verses 30–36भूमिचर लोग भी आकाशगमन आदिरूप दैवी सम्पत्ति को जो प्राप्त हुए हैं, वह भी प्रज्ञारूपी पवित्…
- Verse 37तृष्णा के वर्ग के लोभ, मोह, क्रोध, चिन्ता आदि से उत्पन्न हुए द्वेष, चिन्ता, अविद्या आदि द…
- Verses 38–39हे श्रीरामचन्द्रजी, इस लोक में प्रज्ञा से सारा जगत गुण-दोष तत्त्वविवेक के साथ भलीभाँति दि…
- Verse 40उन्नत अनुपम पद में पहुँचने की इच्छावाले पुरुष को पहले इस मति का ही क्रमशः विवेकशिक्षा द्व…