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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 12, Verses 2–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 12, verses 2–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 2-4

संस्कृत श्लोक

न मनः प्रोल्ललासास्य क्वचिदानन्दवृत्तिषु । केवलं सुषुप्तसंस्थं सदैव व्यवतिष्ठत ॥ २ ॥ ततःप्रभृत्यसौ दृश्यं नाजहार न वात्यजत् । केवलं विगताशङ्क वर्तमाने व्यवस्थितः ॥ ३ ॥ अनारतविवेकेन तेन सद्यः सनातनम् । पुनः कलङ्कं नैवाप्तमम्बरेणेव राजसम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

केवल सुषुप्ति के समान निर्विक्षेपरूप से सदा स्थित रहा । तब से लेकर उन्होने न तो दृश्य का ग्रहण ही किया अथवा न त्याग ही किया, केवल तत्काल में उपस्थित दृश्य मेँ वह निःशंक होकर स्थित रहे। जैसे धूलि से प्राप्त कलंक से आकाश कलंक को प्राप्त नहीं होता वैसे ही निरन्तर विचारवाले राजा जनक ने अनादि स्वभाव प्राप्त, रजोगुण से उदित अहं- मम अभिमानरूप कलंक पुनः प्राप्त किया ही नहीं