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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 12, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 12, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

प्रज्ञावानसहायोऽपि विशास्त्रोऽप्यरिमर्दन । उत्तरत्येव संसारसागराद्राम पेलवात् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे शत्रुतापन, प्रज्ञावान पुरुष के चाहे गुरू आदि सहायक न हों, शास्त्राभ्यास भी उसने न किया हो, फिर भी एकमात्र ज्ञान से बाधित होने के कारण अतिकोमल संसाररूपी सागर से वह निस्तार पा ही जाता है