Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 12, Verses 8–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 12, verses 8–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 8-10
संस्कृत श्लोक
प्रहृष्टो न बभूवासौ क्वचिन्न च सुदुःखितः ।
प्रकृतेर्व्यवहारत्वात्सदैव सममानसः ॥ ८ ॥
जीवन्मुक्तो बभूवासौ ततःप्रभृति मानदः ।
जनको जरठज्ञानी ज्ञातलोकपरावरः ॥ ९ ॥
राज्यं कुर्वन्विदेहानां जनको जनजीवितम् ।
नैव हर्षविषादाभ्यां सोऽवशः परितप्यते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
वे न तो कहीं पर
विशेषरूप से हर्षित हुए ओर न कहीं पर दुःखी हुए । माया के सर्वव्यवहाररूप होने के कारण असंग
आत्मा से उसका स्पर्श न देखने से सदा ही वे समचित्त रहे । प्राणियों का सत्कार करनेवाले ज्ञानवृद्ध
जनक, जिन्होंने लोक में परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर लिया था, तब से लेकर जीवन्मुक्त हो गये । विदेह
देशों का राज्य कर रहे, लोगों के प्राणों के समान, राजा जनक हर्ष ओर विषाद के अधीन होकर उनसे
कभी भी सन्तप्त नहीं होते थे