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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 12, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 12, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

न तद्गुरोर्न शास्त्रार्थान्न पुण्यात्प्राप्यते पदम् । यत्साधुसङ्गाभ्युदिताद्विचारविशदाद्धृदः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

सन्तो की संगति से निर्मलतारूप अभ्युदय को प्राप्त हुए, विचार से विशद चित्त से जो परम पद प्राप्त होता है, वह न तो गुरु के उपदेश से न शास्त्रार्थ के अनुशीलन से और न पुण्य से प्राप्त होता है। (यहाँ पर साधनभूत गुरु, शास्त्रार्थ ओर पुण्य को परमपद को असाधन कहना विचार की प्रधानता के बोधन के लिए है जैसे कि गौ ओर अश्व से भिन्न अपश हैं, गौ तथा अश्व पशु हैं, यहाँ पर गौ और अश्व की प्रधानता के द्योतन के लिए उनसे भिन्न को अपशु कहा है)