Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 12, Verses 11–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 12, verses 11–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 11-14
संस्कृत श्लोक
नास्तमेति न चोदेति गुणदोषविचेष्टितैः ॥ ११ ॥
अर्थानर्थैः स राज्योत्थैर्न ग्लायति न हृष्यति ।
कुर्वन्नपि करोत्येष न किंचिदपि कुत्रचित् ।
स तिष्ठत्येव सततं सर्वदैवान्तरे चितः ॥ १२ ॥
सुषुप्तावस्थितस्यैव जनकस्य महीपतेः ।
भावनाः सर्वभावेभ्यः सर्वथैवास्तमागताः ॥ १३ ॥
भविष्यं नानुसंधत्ते नातीतं चिन्तयत्यसौ ।
वर्तमाननिमेषं तु हसन्नेवानुवर्तते ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
मानसिक गुण ओर दोषों के व्यापार से न तो स्वरूप के
तिरोधानरूप अस्त को प्राप्त होते थे और न पुनः स्वरूप के आविर्भावरूप उदय को प्राप्त होते थे ।
बाहरी राज्य से उत्पन्न अर्थ ओर अनर्थो से न तो उन्हे हर्ष होता था ओर न खेद होता था । कर्म करते
हुए भी वे कहीं पर कुछ भी नहीं करते थे । वे निरन्तर चित् के मध्य में सदा स्थित रहते थे ।
सुषुप्त रूप से स्थित राजा जनक की राग, द्वेष, आदि सब वासनाएँ सब पदार्थों से सर्वथा निवृत्त
हो गई थी । वे न तो भविष्य का अनुसन्धान करते थे ओर न अतीत की चिन्ता करते थे । वर्तमान क्षण
का हँसते हुए अनुसरण करते थे भाव यह कि वासनावश पूर्वोत्तर का अनुसन्धान होता है, उससे पूर्व में
अनिष्ट करनेवाले पदार्थो से द्वेष होता है ओर भावी प्रिय के लिए अनुराग होता हे, तदनन्तर प्रवृत्ति
होती है, यों सब अनर्थो की प्राप्ति वासना से ही होती है । एकमात्र वर्तमान का दर्शन करने में दुःख के
प्रति द्वेष न होने से उसमें अप्रियता का अनुसन्धान नहीं होता, इसलिए वे स्वाभाविक आनन्द की
अनुवृत्ति से हँसते हुए ही एकमात्र वर्तमान क्षण का अनुसरण करते थे