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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 44

तैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त चोवालीसवाँ सर्ग अन्तःपुर की बरबादी को सुनकर राजरानी को भयभीत देखकर राजा का युद्ध के लिए घर से निकलने का और लीला के तत्त्व का वर्णन |

25 verse-groups

  1. Verses 1–3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इसी बीच में राजरानी, जिसके शरीर के रोमरोमसे य…
  2. Verse 4राजमहल में प्रविष्ट होने के अनन्तर जैसे अप्सरा भूतसंग्राम में संलग्न देवराज से निवेदन करे…
  3. Verses 5–7महाराज, देवी, (पट्टरानी) अन्तःपुर से हम लोगों के साथ भागकर जैसे वायु के झोंके से विताड़ित…
  4. Verse 8वर्षाऋतु के बढ़ने के कारण विपुल कलकल नाद करनेवाला जलप्रवाह जैसे कमलों को छिन्न-भिन्न कर म…
  5. Verses 9–10धुएँ की वृष्टि कर रही, तेज धक्‌-धक्‌ शब्द करनेवाली तथा साँप की नाई लपलपा रही ज्वालाओं से…
  6. Verses 11–12महाराज, इस प्रकार जो यह शाखा-प्रशाखाओं के विस्तार से युक्त आपत्ति हम लोगों के ऊपर आई है,…
  7. Verse 13ऐसा कह कर राजा, जिसकी आँखें शत्रुओं के अत्याचार से लाल हो गई थी, जैसे मत्त हाथियों ने जिस…
  8. Verse 14प्रबुद्ध लीला ने अपनी आकृति के तुल्य आकृतिवाली सुन्दरी लीला को दर्पण में प्रतिबिम्ब को प्…
  9. Verse 15प्रबुद्ध लीला ने कहा : हे देवी, जो मैं हूँ, वही यह कैसे ? जो मैं युवावस्था में थी वही मैं…
  10. Verse 16दूसरी यह बात मुझे संशय में डाल रही है कि मन्त्री आदि में भेद प्रतीति और वे ही ये हैं, ऐसी…
  11. Verse 17हे देवि, जैसे दर्पण में बिम्बप्रतिबिम्बरूप से वस्तु बाहर और भीतर भी रहती है, वैसे ही ये स…
  12. Verse 18चितिशक्तियाँ अचिन्तनीय हैं, तुल्य कर्मो से उद्बोधित पदार्थों का कहीं पर समान ही आविभवि हो…
  13. Verse 19जैसा संस्कारात्मक जगत्‌ स्वरूप चित्तमे ओर वितिमे है, वैसा ही वह उदित होता है। भोगकर्ता के…
  14. Verse 20बाह्य पदार्थ आभ्यन्तर से प्रतीत होते हैं, इसके लिए दृष्टान्त खोजने के वास्ते दूर भटकने की…
  15. Verses 21–23चिरकाल से अभ्यास होने के कारण यह जगत्‌ बाह्य नाम से ही व्यक्त होकर सत्यका-सा स्थित हे, उस…
  16. Verses 24–25भला बताओ तो सही जाग्रत पदार्थो की सत्यता कैसी ? उत्तरकाल में (जाग्रत्‌ में) बाधित होने से…
  17. Verse 26दूसरी बात यह भी है कि परस्पर काल मे असत्ता भी दोनो मे समान है, यानी जाग्रत्‌काल' में जैसे…
  18. Verses 27–31पहले दोनों की सत्यता का उपपादन किया था, यहाँ पर असत्यता का उपपादन किया, यों दोनों की ही अ…
  19. Verses 32–34जैसे घने अँधेरे में बालक को जो भूत की भ्रान्ति होती है, वह अन्धकार ही है, भूत नहीं हे, वै…
  20. Verses 35–40वासना के बल से आत्मा में अनात्मा का अध्यास होनें मे दृष्टान्त कहते हैं। पहले अग्नि से भिन…
  21. Verses 41–42अनन्य (अभिन्न) रूप से ब्रह्म में स्थित यह विश्व विश्वशब्द के अर्थो से रिक्त नहीं होगा । भ…
  22. Verse 43हे रामचन्द्रजी, चिरकाल के विचाराभ्यास से हुए दृढ़ अनुभव से जीवत्व को वैसा ही स्पष्टरूप से…
  23. Verses 44–47जीव की जो भोगेच्छा है, वही संसार की उत्पादिका है । इस अंश में सत्यत्व और मिथ्यात्व की उपय…
  24. Verse 48असत्य अनुभूतियाँ जीवाकाश में सत्यसी प्रतीत होती हैं । वैसे ही कुलवाले, वैसे ही सदाचारवाले…
  25. Verses 49–52पूर्वोक्त रीति से प्रतिभा के प्रतिबिम्ब से उत्पन्न हुई यह लीला तुम्हारे सरीखे शील, सदाचार…