Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verses 21–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, verses 21–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 21-23
संस्कृत श्लोक
तदेतद्बाह्यनाम्नैव स्वभ्यासात्सत्स्फुटं स्थितम् ।
यादृग्भावो मृतो भर्ता तव तस्मिंस्तदा पुरे ॥ २१ ॥
तादृग्भावस्तमेवार्थं तत्रैव समुपागतः ।
अन्य एव ह्यमी भूतास्तेभ्यस्तास्तादृशा अपि ॥ २२ ॥
सद्रूपा एव चैतस्य स्वप्नसंकल्पसैन्यवत् ।
अविसंवादि सर्वार्थरूपं यदनुभूयते ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
चिरकाल से अभ्यास होने के कारण यह जगत् बाह्य नाम से ही व्यक्त होकर सत्यका-सा
स्थित हे, उस समय जैसी वासनावाला तुम्हारा पति उस नगर में मरा था, उसी भावना से
युक्त होकर उसी पदार्थ को यहीं पर प्राप्त हुआ हे । वे प्राणी बारबार अनुभूत होते हुए भी उसी
आकार के अन्य ही हैं । इस राजा की चितूसत्ता से ये स्वप्न ओर संकल्प की सेना की नाई
सद्रूप ही हैं। स्वाप्न वस्तु से जाग्रदरस्तु की इतनी ही विलक्षणता हे कि वह अविसंवादिरूप से
सब पुरुषों के लिए समानरूप से अर्थक्रियाकारिता में समर्थ हे ।
केवल इतने से जाग्रत् की सत्यता की सिद्धि नहीं हो सकती, ऐसा कहते है ।
क्योंकि चन्द्रमा की प्रदेशिका (विलस्तभर दिखना) ओर इन्द्रजाल आदि में भी सब को
असंवादी यथार्थ प्रतीति होती है, पर वह सत्य नहीं हे