Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
बाह्यमाभ्यन्तरं भाति स्वप्नार्थोऽत्र निदर्शनम् ।
यदन्तः स्वप्नसंकल्पपुरं च कचनं चितेः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
बाह्य पदार्थ आभ्यन्तर से
प्रतीत होते हैं, इसके लिए दृष्टान्त खोजने के वास्ते दूर भटकने की आवश्यकता नहीं है । इस
विषय में स्वाप्निक पदार्थ दृष्टान्त है, जो सभी को अनुभूत है । चैतन्य में अध्यस्त होने के
कारण चैतन्य का आभ्यन्तर जगत् बाह्य सा प्रतीत होता है, इस विषयमे स्वप्न पदार्थ दृष्टान्त
है, क्योंकि स्वप्न चेतन आत्मा ही पदार्थाकार हो जाता हे । जो स्वप्न ओर मनोरथ के नगर का
भीतर स्फुरण होता है, वह चेतन का ही स्फुरण हे