Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verses 5–7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, verses 5–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 5-7
संस्कृत श्लोक
देव देवी सहास्माभिः पलाय्यान्तःपुरान्तरात् ।
शरणं देवमायाता वातार्तेव लता द्रुमम् ॥ ५ ॥
राजन्दारा हृतास्तास्ते बलवद्भिरुदायुधैः ।
ऊर्मिजालैर्महाब्धीनां तीरद्रुमलता इव ॥ ६ ॥
अन्तःपुराधिपाः सर्वे पिष्टाः शत्रुभिरुद्धतैः ।
अशङ्किताभिपतितैर्वातैरिव वरद्रुमाः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज, देवी, (पट्टरानी) अन्तःपुर से हम लोगों के साथ
भागकर जैसे वायु के झोंके से विताड़ित लता वृक्ष की शरण लेती हे, वैसे ही आपकी शरण में
आई हे । महाराज, आपकी अन्यान्य रानियो को, जैसे महासागर की बड़ी-बड़ी लहर तटवर्ती
वृक्षों मेँ आश्रित लताओं को हर ले जाती हैं, वैसे ही अस्त्रशस्त्र से सुसज्जित बलवान् शत्रु हर
ले गये हैं। अचानक आये हुए उद्धतशत्रुओं ने अन्तःपुर के संरक्षार्थ नियुक्त अधिकारियों को
ऐसे चकनाचूर कर डाला जैसे कि सहसा झौंके के साथ आई हुई भीषण आँधी सुन्दर वृक्षोंका
चकनाचूर कर डालती है