Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verses 41–42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, verses 41–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 41,42
संस्कृत श्लोक
रिक्तं न विश्वशब्दार्थैरनन्यद्ब्रह्मणि स्थितम् ।
न तत्सत्यं न चासत्यं रज्जुसर्पभ्रमो यथा ॥ ४१ ॥
मिथ्यानुभूतितः सत्यमसत्यं सत्परीक्षितम् ।
परमं कारणं चित्त्वाज्जीवत्वमिति चेत्यलम् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
अनन्य (अभिन्न) रूप से ब्रह्म में स्थित यह विश्व विश्वशब्द
के अर्थो से रिक्त नहीं होगा । भाव यह है कि विश्वशब्द का पर्यवसान पूर्णार्थता में है और
पूर्ण रिक्त नहीं हो सकता है । रज्जु में सर्पं भ्रान्ति के समान न यह सत्य है और न असत्य
है, किन्तु अनिर्वचनीय है, मिथ्याज्ञान से यह सत्य प्रतीत होता है और विचारपूर्वक देखने
से असत्य ही है, भाव यह है कि भ्रान्तिज्ञान से अनुभूत पदार्थ सत्य नहीं होता और वस्तुतत्त्व
का निर्धरिणात्मक ज्ञान, जो कि मर्मज्ञान से अनुभूत पदार्थ का बाधक है, सत्यका निषेध
नहीं करता, जिससे कि असत्य हो । परम कारण ही स्वरूपभूत चैतन्य से माया से आवृत
होनेके कारण जीवत्व को प्राप्त हुआ, अतः जीवत्व भी अनिर्वाच्य है