Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 44, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
तत्रापीह च हे देवि सर्वे कथमवस्थिताः ।
बहिरन्तश्च मुकुरे इवैते किं प्रचेतनाः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे देवि, जैसे दर्पण में
बिम्बप्रतिबिम्बरूप से वस्तु बाहर और भीतर भी रहती है, वैसे ही ये सभी वहाँ पर और यहाँ पर
कैसे स्थित हैं ? कया वे चेतन हैं ? भाव यह कि ये दर्पण में स्थित प्रतिबिम्ब की नाईं वे ही यदि
यहाँ प्रतिबिम्बित हुए हैं, तो अचेतन होंगे, चेतन कैसे हो सकते हैं ?